Q128.“मीत सुजान अनीत करौ जिन, हाहा न हूजियै मोहि अमोही । डीठि. कौ और कहूँ नहिं ठौर फिरी दृग रावरे रूप की दोही। एकबिसास की टेक गहे लगि आस रहे बसि प्रान-बटोही। हां घनआनँद जीवनमूल दई कित प्यासनि मारत मोही ।”
Correct answer: प्रिय का जीवनदायी होकर पिपासा शांत करना